बेहट (सहारनपुर) मां की ममता से लेकर हीर की मुहब्बत तक और मज़हबी प्यार से लेकर कौमी एकता की मजबूती तक को शब्दों में ढ़ालकर देश और दुनिया मे अपना और अपने शहर का नाम रौशन करने वाले इस नौजवान की शायरी के लोग खूब दीवाने है। स्टेज ओर माइक थामने के बाद तो मानो पब्लिक वापस लौटने ही नही देती। हाय-होल्ला कर कई कई बार माइक के सामने बुलवाना तो मानो आम सी बात हो गई है।
आज हम बात कर रहे है हरदोई जिले के छोटे से शहर पिहानी में जन्मे युवा शायर सलमान जफर की। दरअसल, सलमान जफ़र बेहट तहसील के गांव ताजपुरा में आयोजित ऑल इंडिया मुशायरे में शामिल होने आए था। मुशायरे के बाद वे बेहट कस्बे के निवासी अपने दोस्त शेख़ परवेज़ आलम के आवास पर पहुंचे जहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। इस दौरान आलमी शायर सलमान जफर से ख़ास बातचीत की गई। स्टूडेंट से शायर बनने के सफर के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि शायर बना नही जाता बल्कि शायर तो पैदा होते है। जब वो कालेज में पढ़ते थे और किसी कार्यक्रम में उन्हें स्टेज पर आने का मौका दिया जाता था तो वे अपनी लिखी शायरी सुनाते थे। हालांकि उस दौरान किसी को मालूम नही होता था कि ये शायरी खुद सलमान जफ़र लिखते है। धीरे-धीरे उनकी शायरी के चर्चे कॉलेज की चारदीवारी से निकलकर आस-पास के जिलों में होने लगे। सलमान जफ़र बताते है कि उन्हें पहली बार फतेहपुर में आयोजित ऑल इंडिया मुशायरे में बुलाया गया और उस मुशायरे में सामाइन ने उन्हें तीन-तीन बार माइक के सामने बुलाया। सलमान जफ़र कहते है कि दुनिया मे मां की मुहब्बत से बढ़कर कुछ नही। खुशी हो या गम, कितनी भी मुश्किलें हो, अगर मां की मुहब्बत साथ हो तो सबकुछ आसानी से गुज़र जाता है।उन्होंने शेर सुनाते हुए कहा कि कहा कि “दुनिया की फ़िक्र छोड़ न यूँ अब उदास बैठ,
ये वक़्त रब की देन है, अम्मी के पास बैठ”। उन्होंने कहा कि आज का नौजवान मुहब्बत में ईतना मशगूल हो जाता है कि वो सबकुछ भूल जाता है। उन्होंने शेर सुनाया कि- “अना को अपनी समझाना पड़ेगा, बुलाती है, तो फिर जाना पड़ेगा,। सलमान जफ़र कहते है कि हमे सबके साथ मिलजुलकर मुहब्बतों से रहना चाहिए। “तीस रोज़ों से यही हम को मिला है पैग़ाम, अपने दुश्मन को चलो ईद मुबारक कह दें” इस शेर के ज़रिए वे दुश्मन के साथ भी मुहब्बतभरा व्यवहार चाहते है। मज़हबी एकता को मजबूत करने वाला उनका ये शेर मुल्क ही नही बल्कि गैर मुल्कों में भी लोगो के दिलो दिमाग पर छाया रहता है। मज़हबी कट्टरता के खिलाफ सलमान जफ़र कहते है कि “सख्ती थोड़ी लाजिम है पर पत्थर होना ठीक नहीं, हिन्दू मुस्लिम ठीक है साहब कट्टर होना ठीक नहीं। जब सलमान जफ़र से पूछा गया कि शायरी कैसे करते हो तो उन्होंने अपना जवाब इस शेर से दिया कि “कर के लहजे में कई रद्दो बदल आती है, कितनी मुश्किल से मेरे लब पे ग़ज़ल आती है”। आखिरी में उन्होंने नौजवानों की नज़र एक शेर करते हुए कहा “लहू का ज़िक्र पानी में करेंगे, इज़ाफ़ा ये कहानी में करेंगे। बुढ़ापे का भरोसा ही नहीं है, इबादत नौजवानी में करेंगे”।

